डॉ.सी. वी. रमन का वैज्ञानिक जीवन / Dr. CV Raman’s scientific career

डॉ.सी. वी. रमन का वैज्ञानिक जीवन

Dr. CV Raman

27 नवंबर 1888 से 21 नवंबर 1970

चंद्रशेखर वेंकटरमन नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रथम भारतीय थे. और वे भारत के एक महान वैज्ञानिक भी थे.उन्हें के नाम से खोजे गए उनके ‘रमन प्रभाव ,प्रकाश के प्रकीर्णन की खोज के लिए उन्हें वर्ष 1930 में नोबेल पुरस्कार दिया गया था

जीवन परिचय

डॉक्टर चंद्रशेखर वेंकटरमन का जन्म 27 नवंबर 1888को तमिलनाडु के ऋतु पल्ली मैं हुआ था उनकी माता का नाम पार्वती अमला तथा पिता चंद शेखर अंक गणित और भौतिकी के अध्यापक थे  रमन बचपन से ही प्रखर प्रतिभा के धनी थे 12 वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और 15 वर्ष की आयु में भौतिकी और अंग्रेजी में विशेष योग्यता के साथ स्नातक की परीक्षा भी उत्तीर्ण की सरकार छात्रवृत्ति पर उन्हें इंग्लैंड पढ़ने भेजना चाहती थी लेकिन खराब स्वास्थ्य के कारण रमन विदेश नहीं जा सके और मद्रास में ही पढ़ाई करने लगे

17 वर्ष की आयु में उन्होंने विशेष योग्यता के साथ मास्टर डिग्री हासिल की और उन्हें पूरी यूनिवर्सिटी में प्रथम स्थान मिला इसी साल 1907मैं लोक सुंदरी अमल से उनका विवाह हुआ और उनका एक बेटा हुआ प्रेसीडेंसी कॉलेज में मद्रास में अध्ययन के दौरान रमन ने प्रकाश का शोध किया उन्होंने पाया कि जब प्रकाश की किरणें किसी छिद्र से होकर या किसी अपारदर्शी वस्तु के किनारे होकर गुजरती है तथा किसी पर्दे पर पड़ती है तो किरणों के किनारे मंद तीव्रता रंगीन प्रकाश की पत्तियां दिखाई देती हैं। यह घटना विवर्तन कहलाती है.उनका यह शोध लंदन की एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

चंद्रशेखर वेंकटरमन में उत्कृष्ट वैज्ञानिक बनने की प्रचुर क्षमता थी लेकिन सुविधाओं के अभाव में उन्होंने भारत सरकार के वित्त विभाग की प्रयोग प्रतियोगिताओं ने भाग लिया। परीक्षा में भी प्रथम आए और जून 1997 में असिस्टेंट अकाउंट जनरल बनकर कोलकाता चले गए। उन्होंने ध्वनि के कंपन पर अनुसंधान किया और वाद्य यंत्रों की भौतिकी के विशेषज्ञ बन गए।

रमन सन 1927 में जर्मनी में प्रकाशित 20 खंडों वाली भौतिक विश्वकोश के आठवी खंड के लिए वाद्य यंत्रों की भौतिकी का लेख रमन से तैयार  कराया गया ।इस विश्वकोश में केवल वे एक ही जर्मनी से बाहर के लेखक थे।सन 1917 में कुलपति आशुतोष मुखर्जी के आमंत्रण पर में भौतिकी के प्राध्यापक बन कर कोलकाता गए। यहां अध्यापन के साथ में वस्तुओं के प्रकाश चालक का अध्ययन करने लगे। उन्होंने देखा कि किरणों का पूर्ण समूह सीधा नहीं चलता बल्कि कुछ भाग रास्ता बदल कर बिखर जाता है।

सन 1921 में एक बार जब पर लंदन से जहां से स्वदेश लौट रहे थे तब उन्होंने सागर जल में अनोखा  नीला पन दूधिया पन देखा जो किरणों के फेलाव का कारण थाइस किरण बिखराव के अध्ययन में जुट गए उनकी किरण प्रकीर्णन की यही खोज रमन प्रभाव के नाम से विख्यात में विभिन्न प्रयोगों द्वारा उन्होंने अपनी खोज को सत्यापित किया सन 1924 में रमन ने रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन का फैलो बनाया गया. सन 1948 में भौतिकी के अध्ययन हेतु उन्होंने बेंगलुरु में रमन शोध संस्थान की स्थापना की।

वर्ष 1954 में भारत रत्न द्वारा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया।वर्ष 1957  में रमन को रूस का लेनिन शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।इसके अलावा उन्हें अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। 28 फरवरी को उन्होंने रमन प्रभाव की खोज की इसलिए उस तारीख को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है रमन मृत्यु पर्यंत तक   रमन शोध संस्थान से जुड़े रहे। 82 वर्ष की आयु में 21 नवंबर 1970 को बेंगलुरू में उनका स्वर्गवास हो गया।सी वी रमन का जीवन चुनौतियों से भरा था। मगर वे बिना रुके निरंतर आगे बढ़ते रहें

 

डॉ.सी. वी. रमन का वैज्ञानिक जीवन / Dr. CV Raman’s scientific career

Rajesh Sharma

Blogger, Researcher, Author

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